Friday, August 31, 2018

किसान आत्महत्याओं की बंजर ज़मीन पर उम्मीदें बोता एक स्कूल

महाराष्ट्र के बीड ज़िले में इस बार भी मानसून देर से ही आया है. काली मिट्टी के खेतों को पार करते हुए हम यहां मौजूद बालाघाट की पहाड़ियों के बीच बसे थलसेरा गांव पहुंचते हैं.
यहां खेतों के बीच बने एक कमरे के घर में 65 वर्षीय लक्ष्मी बाई अपनी एक बकरी और दो मुर्ग़ियों के साथ रहती हैं. उनका पूरा परिवार इलाक़े में दो दशकों से चल रही किसान आत्महत्याओं की वजह से बिखर गया.
ज़िले के सैकड़ों दूसरे किसानों की तरह ही, लक्ष्मी के पति ने भी कर्ज़ के चलते कुएँ में कूदकर आत्महत्या कर ली थी. बदहाली से परेशान उनका बेटा शिवाजी खेतों में मज़दूरी करने लगा, लेकिन उनकी भी जल्दी ही एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई.
शिवाजी की मौत के बाद एक सुबह अचानक लक्ष्मी की बहू नंदा अपने तीनों बच्चों को छोड़कर कहीं चली गई. लेकिन यह कहानी लक्ष्मी या उनके किसान पति या बेटे की नहीं है.
साथ ही ये कहानी मराठवाड़ा के उन सभी बच्चों की है जिनकी एक पूरी पीढ़ी घर में माता-पिता या किसी अन्य परिजन को खेती के नाम पर लिया गया क़र्ज़ न चुका पाने की वजह से आत्महत्या करते देख चुकी है. और अब ये इलाक़े में चल रहे 'शांतिवन' नाम के एक स्कूल की मदद से अपने पैरों पर वापस खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं.
लक्ष्मी बाई का 14 वर्षीय पोता सूरज शिवाजी राव अपनी दो छोटी जुड़वां बहनों के साथ बीड के अरवि गांव में बने इसी स्कूल में पढ़ता है. माँ के जाने के बाद भाई के बच्चों की देखभाल करने वाली सूरज की बुआ जीजा बाई बताती हैं कि किसान आत्महत्या के दुष्चक्र में फंसे परिवारों के लिए 'शांतिवन' उम्मीद की एक किरण है.
"शुरू-शुरू में तो बच्चे बहुत रोते थे. उनके दादा ने ख़ुदकुशी कर ली...पिता एक्सीडेंट में मारे गए... माँ रोता छोड़ के चली गई...पर इतना सब कुछ समझने के लिए वो बहुत छोटे थे. सूरज सात साल का था और उसकी बहनें तो सिर्फ़ 4-4 साल की थीं. बच्चे पूरे गांव में घूम-घूम कर अपने माता-पिता को ढूँढ़ते. घर-घर जाकर पूछते कि मेरी मां कहां है? हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. तभी शांतिवन के आवासीय स्कूल के बारे में पता चला और हमने तुरंत बच्चों को वहां पढ़ने के लिए भेज दिया."
सूरज से मिलने के लिए हम थलसेरा से 45 किलोमीटर दूर अरवि गांव में मौजूद शांतिवन स्कूल के आवासीय परिसर में पहुंचते हैं. यहां नवीं कक्षा में पढ़ रहे सूरज के साथ साथ हमारी मुलाक़ात शांतिवन के संस्थापक और प्रधानाध्यापक दीपक नागरोजे से भी होती है.
बाबा आम्टे से प्रभावित दीपक ने आज से 18 साल पहले अपने परिवार की 7.5 एकड़ ज़मीन पर शांतिवन की स्थापना की थी. "मैं 18 साल का था जब मैंने बाबा आम्टे के काम के सम्पर्क में आया. उसके बाद मुझे लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, मज़ा तो दूसरों के लिए जीने में है. मैं बीड के बालाघाट इलाक़े से आता हूँ. हमारे यहाँ ज़मीन पथरीली है और खेतों में सिर्फ़ एक फ़सल हो पाती है."
"हर दूसरे साल सूखा भी पड़ता है. इसलिए यहां खेती हमेशा से संकट में रही. क़र्ज़ में डूबे किसान सालों से आत्महत्या कर रहे हैं. मैंने सोचा की अपनी जान ख़ुद लेने वाले इन किसानों के बच्चों का क्या होता होगा? परिवार के बड़ों के जाने के बाद इनकी परवरिश और पढ़ाई-लिखाई तो सब ठप्प हो जाती होगी."
यही ग़रीबी और बेरोज़गारी फिर नई आत्महत्याओं का कारण बनते हैं. कर्ज़ के इस दुष्चक्र को पहचानने वाले दीपक ने किसान आत्महत्याओं वाले परिवारों को चिन्हित कर उनके बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाना शुरू किया.
वह जोड़ते हैं, "आज शांतिवन में कुल 800 बच्चे पढ़ते हैं. इनमें से 300 बच्चे यहां स्कूल होस्टलों में रहते हैं. इन 300 आवासीय बच्चों में 200 बच्चे किसान आत्महत्याओं वाले परिवारों के बच्चे हैं. इनके रहने-खाने और पढ़ने की पूरी व्यवस्था स्कूल परिसर में ही है."
बिना किसी सरकारी मदद के नर्सरी से कक्षा 10 तक चलने वाले इस स्कूल को चलाने के लिए दीपक अपनी पारिवारिक ज़मीन पर उपजाए गए अनाज और सब्ज़ियों के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुदान भी स्वीकार करते हैं.
लंच के लिए स्कूल की मेस की तरफ़ जाता हुआ सूरज अपने गांव थलरेसा की परिस्थितियों से दूर एक ख़ुशहाल बच्चा लगता है. गांव और दादी के बारे में पूछने पर उसकी आंखें तुरंत छलछला जाती हैं.
"कभी-कभी घर की याद आती है. पर मैं यहाँ ख़ुश हूँ. स्कूल में हम इतिहास, नागरिक शास्त्र, मराठी, हिंदी, गणित और भूगोल जैसे सभी विषय पढ़ते हैं. यहां मेरे अच्छे दोस्त भी बन गए हैं. मैं यहां पढ़कर आगे डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहता हूँ."
सूरज की ही तरह शांतिवन में बड़ी हुई बीड के गेओराइ तहसील की रहने वाली पूजा किशन आऊटे आज ज़िला मुख्यालय में कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी आत्महत्या के दुश्चक्र में फंसे मराठवाड़ा और विदर्भ के किसान परिवारों के लिए पूजा एक मिसाल बन सकती हैं.
काली जींस और गाजरी रंग की क़मीज़ पहने मेरे सामने खड़ी 20 साल की पूजा पहली मुलाक़ात में ही अपने उत्साह और गर्मजोशी से आपको प्रभावित करती हैं. अपनी ख़ुशमिज़ाजी और ऊर्जा के पीछे तकलीफ़ों का पहाड़ छिपाए बैठी पूजा बड़ी होकर अपने इलाक़े के किसान परिवारों की ज़िंदगी को बेहतर बनाना चाहती हैं.
अपने परिवार और पढ़ाई के बारे में बताते हुए वह जोड़ती हैं, "मेरे पिताजी ने खेती के लिए कर्ज़ लिया था जो वह चुका नहीं पा रहे थे. हमारी ज़मीन बहुत कम थी...जिसपर मेरे पिता अपने बड़े भाई के साथ मिलकर खेती करते थे. पर मेरे ताऊ सारा पैसा ख़ुद रख लेते और कर्ज़ मेरे पिता के सर रह जाता. उन्होंने ज़मीन ठेके पर लेकर भी खेती की, पर कर्ज़ नहीं उतरा. मांगने वाले घर आते तो वह कह देते की दे दूंगा. लेकिन अंदर ही अंदर टेंशन में रहते".
जब पूजा दसवीं कक्षा में थीं, तब एक दिन अचानक उनके पिता ने अपने हाथ-पैर रस्सी से बांधे और अपने घर के पास बने कूएँ में कूद गए.
अपनी मासूम आंखों में पानी लिए पूजा आगे बताती हैं, "उनको तैरना आता था और उन्हें लगा होगा कि वो तैर कर ऊपर आ सकते हैं. इसलिए उन्होंने अपने हाथ-पैर बांधकर कुएँ में छलांग लगाई. मेरे घर में अब सिर्फ़ मेरी माँ हैं जो मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करती हैं."
लेकिन अपनी त्रासदी को भुलाकर एक नई शुरुआत करने वाली पूजा स्नातक के बाद आगे और पढ़ना चाहती हैं. "मैं आगे मास्टर डिग्री भी करूंगी और उसके बाद किसी अच्छी कम्पनी में जॉब करूंगी. नौकरी लगते ही सबसे पहले मैं अपनी मां को गांव से यहां ले आऊंगी. मैं उसे हमेशा अपने साथ रखूंगी और कभी भी खेती नहीं करने दूंगी."

Wednesday, August 29, 2018

中国或提前达到碳排量峰值?

中国的二氧化碳排放何时会达到峰值?最近这个问题再次引发关注甚至成为争论的焦点。因为9月联合国将召开一次重要的气候峰会,美国总统巴拉克·奥巴马和中国国家主席习近平都将出席会议。

本月早些时候,多国环保部长于德国召开会议,中国首席气候谈判代表解振华在发言时指出,作为世界上最大的碳排放国,中国可能于明年提出达到碳排放“峰值年”的时间。

但与目前碳强度下降目标不同的是,确定碳排放总量峰值并不意味着中国一定会引入碳排放总量控制政策。不过,在有关峰值年的争论中,还是有人对这一政策抱有希望,特别是在中国国家气候变化专家委员会副主任何建坤公开表示,中国下一个五年计划(2016-2020)很有可能引入总量控制政策之后。

中国人大代表王毅在接受中外对话采访时说,“十三五计划”应考虑纳入“总量控制政策”。

清华大学能源环境和经济研究所主任何建坤与英国著名经济学家尼古拉斯·斯特恩合作为Project Syndicate撰文指出,中国政府致力于建设“更具创新性、包容性、可持续性以及更高效的”经济,而相关计划正在“制定和实施过程中”。

他们表示,这些计划包括中国对可再生能源领域的巨额投资以及为减少对重工业的依赖和实现“更为稳定和高质量的GDP增长”而做出的调整。

文章称,下一个五年计划应该包括加大研发投资以及“对煤炭消费和温室气体排放实施更为严格的限制”。

那么,中国的二氧化碳排放何时会达到峰值?斯特恩和何建坤认为,中国的气候政策预示着碳排放可能在2030年达到峰值,同时经济增长率保持在4%-5%。文中写道,这些目标“非常宏大”但又“完全能够实现”。他们进一步指出,如果中国“决策者和企业有足够的决心”,中国可能会“提前达到清洁能源目标”。

斯特恩和何建坤说,“中国实现可持续发展的决心”将提高2015年联合国巴黎气候会谈达成全球性协议的几率。

Monday, August 13, 2018

雾炮车是“治霾神器”吗?

冬季雾霾的到来迫使北京等华北城市先后启动雾霾红色预警。一些市政府启用了工业设备“雾炮车”来应对空气中的有毒颗粒物。

高达三四米的“雾炮车” 的图片 频繁出现在新闻媒体上,用以展示政府正积极采取措施应对由煤炭和钢铁企业造成的雾霾及其健康危害。但批评者认为这些“雾炮车”对于雾霾治理并没有什么效用,反倒转移了公众对污染根源的注意,同时让该设备的制造企业大发其财。

受到雨后空气污染水平显著下降的启发,一些城市从去年开始用“治霾神器”来对付季节性雾霾。这个“神器”原本是矿山及建筑工地用来消除粉尘的,如今则被改装成放在卡车上的移动式雾炮。

今年这些雾炮车再次出现在更多的城市,包括中部城市重庆和长沙等,数量也在不断增加。据《南方都市报》报道,迄今来自多个省市的雾炮车订单已经达到61个,其中雾霾重灾区河北省就有11单。

雾炮的工作原理就是将雾化的水喷洒出去,捕捉空气中的灰尘颗粒。但科学家们认为,雾炮对健康危害最大的细颗粒物并没有什么作用。

最新型的雾炮车价格约为每台62万元(约合9万美元)。2014年,有厂家开始将这种工业设备重新包装为环保设备,接到了第一笔订单。据《南方都市报》报道,2012年全国这种设备的制造商还不到十家。但《南华早报》的一篇报道指出,如今雾炮车的销售十分火爆,很多价格很低的三无产品出现在市场上。

郑州环保人士崔晟认为,如果在监测站附近使用雾炮车,空气污染数据将受到干扰。雾炮车具有局部效果,会让指标看起来比不用时更好,但造价昂贵且作用范围有限。

这些“治霾神器”在改善空气质量上究竟效果如何还是一个未知数。它们使用的方法(即通常所说的“降水清除”或“湿沉降”)是通过降尘来减少空气中的颗粒污染。但研究表明,尽管这一技术可以清除较大的污染颗粒物,但对更小、危害性更大的PM2.5颗粒则效果较差。

雾炮车厂家对这种说法予以驳斥,声称炮车的雾汽细密到足以清除PM2.5颗粒。但是他们并没有拿出任何明确的证据来支持这一说法。中科院环境科学专家张元勋担心某些颗粒物可能与水发生反应并扩散。

相同逻辑的解决方法不止这一种,其中最引人注目的要数使用喷淋器制造人工暴雨。这一方法是浙江大学教授俞绍才在2014年《环境化学杂志》上的一篇论文中提出的。他建议在高层建筑顶部安装喷淋系统,模仿暴雨效果清除污染颗粒。但这一方法在试验阶段后并未继续推进。

就算雾炮车对治理污染有效,其耗水量之大也是不可持续的。工业密集,且汇集了多座雾霾最重的城市的华北地区同样面临干旱缺水问题。这些城市每年靠南水北调工程从南方调配几十亿立方米的水来维持基本生活。

所以,还是老问题——这些所谓的治霾技术对于空气污染来说都是治标不治本。

在中国城市普遍推广雾炮车需消耗数量巨大的能源和水,效果却是短暂和有限的。鉴于这些资源已经非常紧张,抵御空气污染最有效的方法仍然是从源头上减少污染。