Tuesday, August 20, 2019

चांद पर भारत की नींव रखने वाले डॉक्टर विक्रम साराभाई, जो परमाणु बम के ख़िलाफ़ थे- विवेचना

12 अगस्त, 1919 को जब अहमदाबाद के कपड़ा मिल मालिक अंबालाल साराभाई के घर एक लड़का पैदा हुआ तो सबका ध्यान सबसे पहले उसके कानों की तरफ़ गया.
वो कान इतने बड़े थे कि जिसने भी देखा उसी ने कहा कि वो गांधीजी के कानों से बहुत मिलते हैं.
अंबालाल के करीबी लोगों ने मज़ाक भी किया कि इन कानों को पान की तरह मोड़ कर उसकी गिलोरी बनाई जा सकती है. इस लड़के का नाम विक्रम अंबालाल साराभाई रखा गया.
उस समय साराभाई के अहमदाबाद वाले घर में भारत के चोटी के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक जैसे जगदीश चंद्र बसु और सीवी रमण, मशहूर इतिहासकार जदुनाथ सरकार, राजनेता और वकील बुलाभाई देसाई, जानी मानी नृत्यांगना रुक्मणी अरुंदेल और दार्शनिक गुरु जिद्दू कृष्णामूर्ति जैसे लोग ठहरा करते थे.
साल 1920 में रविंद्र नाथ टैगोर अहमदाबाद आए थे
विक्रम साराभाई की जीवनी लिखने वाली अमृता शाह बताती हैं, "टैगोर को किसी शख़्स के माथे को देख कर उसके बारे में भविष्यवाणी करने का शौक़ था. जब नवजात विक्रम को उनके सामने ले जाया गया तो उन्होंने उनके चौड़े और असमान्य माथे को देख कर कहा था, "ये बच्चा एक दिन बहुत बड़े काम करेगा."
और साराभाई के घर पर ही रुके थे.
बाद में जब विक्रम साराभाई ने केंब्रिज में पढ़ने का फ़ैसला किया तो टैगोर ने उनके लिए एक 'रिकमंडेशन लेटर' लिखा था.
विक्रम साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई आज भारत की जानी-मानी नृत्यांगना हैं.
वो बताती हैं कि उन्होंने अपने पिता को हमेशा अपने विचारों में मग्न देखा. मशहूर चित्रकार रोडां की कलाकृति 'थिंकर' की तरह उनका हाथ हमेशा सोच की मुद्रा में उनकी ठुड्डी पर रहता था.
मल्लिका याद करती है, "मेरे पिता ज़मीन से जुड़े हुए शख़्स थे. हर एक की बात वो बहुत ध्यान से सुनते थे. हमेशा सफ़ेद खादी का कुर्ता पाजामा पहनते थे. जब बहुत ज़रूरी होता था तो वो सूट पहनते थे. लेकिन उसके ऊपर जूते की बजाय कोल्हापुरी चप्पल पहना करते थे.वो हम दोनों बच्चों पर बहुत गर्व करते थे."
"वो बहुत लोकतांत्रिक इंसान थे. मुझे याद है एक बार वो कार ख़रीदना चाह रहे थे. उन्होंने हम सब से पूछा कि किस रंग की कार ली जाए. मैं तीन साल की थी."
"मैंने हठ पकड़ ली कि अम्मा की कार गुलाबी रंग की होगी. उन्होंने और मेरी मां ने पूरे तीन दिनों तक मुझे समझाया और जब मैं मानी तभी उन्होंने काले रंग की फ़िएट कार ख़रीदी."
कैंब्रिज से वापस लौटने के बाद विक्रम साराभाई 'इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस' बंगलौर चले गए, जहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमण की देखरेख में अपना शोध जारी रखा.
वहीं, उनकी मुलाकात महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से हुई, जिन्होंने उनकी मुलाकात मशहूर नृत्यांगना मृणालिनी स्वामीनाथन से कराई जो बाद में उनकी पत्नी बनीं.
मल्लिका साराभाई याद करती हैं, "होमी भी अच्छी चीज़ों के पारखी थे. कलाकार थे और स्वयं चित्र बनाया करते थे. मेरे पिता और उनमें बहुत दोस्ती थी. वो अक्सर मेरे पिता को चिढ़ाते थे कि तुम इतने ख़ूबसूरत भारतीय कपड़ों में क्यों घूमते हो ? एक वैज्ञानिक की तरह कपड़े क्यों नहीं पहनते ? मेरी मां और भाभा बैडमिंटन पार्टनर थे. उन्होंने ने ही मेरे पिता को पहली बार मेरी मां से मिलवाया था."
दिलचस्प बात ये है कि शुरू में विक्रम और मृणालिनी एक दूसरे के प्रति आकर्षित नहीं थे.
अमृता शाह बताती हैं, "मृणालिनी और विक्रम जब पहली बार मिले तो उन्होंने एक दूसरे को पसंद नहीं किया. मृणालिनी टेनिस शॉर्ट्स मे थी और विक्रम को उनकी ये पोशाक रास नहीं आई."
"बाद में वो बहुत शिद्दत से भरतनाट्यम सीखने लगीं. वो इस नृत्य से इस हद तक जुड़ी हुई थी कि उन्होंने अविवाहित रहने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन विक्रम ने उनसे मिलना-जुलना शुरु कर दिया. वो साथ साथ भुट्टा खाते थे."
दोनों ऊपरी तौर से तो कह रहे थे कि उनका शादी का कोई इरादा नहीं है, लेकिन दोनों धीरे-धीरे उसी तरफ़ बढ़ रहे थे. उनकी शादी पहले वैदिक रीति से हुई फिर उन्होने सिविल मैरेज भी की. शादी के दिन मृणालिनी ने सफ़ेद खद्दर की साड़ी पहन रखी थी और उनके शरीर पर ज़ेवरों की जगह फूल थे. विक्रम के अनुरोध पर मृणालिनी और उनकी एक दोस्त ने रामायण के हिरण वाले दृश्य पर एक नृत्य किया था."
जिस दिन उनकी शादी हुई उसी दिन वो ट्रेन से बंगलौर से अहमदाबाद के लिए रवाना हुए. वो भारत छोड़ो आंदोलन के दिन थे. आंदोलनकारियों ने हर जगह रेल की पटरियां उखाड़ दी थीं जिसकी वजह से जो यात्रा 18 घंटे में पूरी होनी थी, उसे पूरा होने में पूरे 48 घंटे लगे. इस तरह विक्रम और मृणालिनी ने अपना हनीमून ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास के कूपे में मनाया.
जब विक्रम अपनी नई-नवेली पत्नी के साथ अहमदाबाद अपने घर पहुंचे तो वहां उदासी छाई हुई थी, क्योंकि विक्रम की बहन मृदुला आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के कारण 18 महीने की जेल की सज़ा काट रही थीं.
अंबालाल साराभाई ने प्रशासन से अनुरोध किया कि उन्हें छोड़ दिया जाए ताकि वो अपने भाई और भाभी से मिल सकें. गवर्नर रॉजर लमले इसके लिए तैयार भी हो गए लेकिन मृदुला ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया.
"मृणालिनी उन्हें बांगला गीत सुनाती थीं जो उन्होंने शांति निकेतन के अपने प्रवास के दौरान सीखे थे. विक्रम उन्हें कालिदास के उद्धरण सुनाते थे."