हालांकि स्टुअर्ट फ्लिन्डर्स ने अपनी किताब में इसका कोई जिक्र नहीं किया है और ये एक तरह से सही भी था.
जॉन निकोल्सन की इस जीवनी में दिल्ली वालों के बारे भी पढ़ना दिलचस्प है जो कभी-कभी उनके मकबरे पर जाते हैं.
एक आयरिश डॉक्टर के पांच बेटों में सबसे बड़े जॉन की प्रतिमा दिल्ली के कश्मीरी गेट से हटाकर बेलफास्ट भेज दी गई.
और अब वो मूर्ति उत्तरी आयरलैंड के डंगैनन शहर की शोभा बढ़ा रही है.
निकोल्सन अपने लोगों के 'डार्क हीरो' थे तो प्रसिद्ध मुल्तानी हॉर्स की टुकड़ी के के जवानों के बीच 'निकल सेन' नाम से मशहूर थे.
ये
जवान उनके अंतिम संस्कार के अवसर पर फूट-फूट कर रोये थे और उसकी कब्र की
घास अपने हाथों में लेकर उन्होंने लड़ाई में आगे हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था.
इन सैनिकों ने मुल्तान से भी आगे अपने उन स्थानों पर वापस लौटना और 34
साल की आयु में ही प्राणों की आहूति देने वाले अपने दिवंगत कमांडर के
सम्मान में शोक मनाना पसंद किया जहां से वे आए थे.
मुल्तान अब पाकिस्तान में है और यहां निकोल्सन की एक और प्रतिमा के स्थापित होने का इंतजार है.
साथी सैनिकों की इसी मोहब्बत ने अनजाने में ही रहस्यमयी पंथ 'निकल सेन' को जन्म दिया.
हालाकि
इस बात पर हैरत होती है कि यदि निकोल्सन की ज़िंदगी लंबी होती तो क्या
उन्हें इसी तरह की शोहरत हासिल होती और क्या उनके निष्ठुर तौर-तरीकों से उनकी लोकप्रियता पर ग्रहण नहीं लग जाता?
फ्लिन्डर्स कहते हैं कि इस घटना के करीब डेढ़ सदी बाद मुगलों का बसाया ये शहर काफी बदल चुका है.
वो
लिखते हैं, "ब्रिटिश हुकूमत के वक़्त के शाहजहांनाबाद शहर और उनके द्वारा
बसाई गई नई दिल्ली के बीच हमेशा की तरह ही कम से कम सरकारी इमारतों के
इर्द-गिर्द के इलाकों के मामले में अंतर साफ नजर आता है."
"अंग्रेजों के 1947 में भारत छोड़ने के बाद दोनों ही शहरों के बेतरतीब विकास की वजह से दोनो ही बौने लगते हैं. यहां तक कि नदी ने भी अपना रास्ता
बदल लिया है. लाल किले के साथ जहां कभी यमुना या जैसा ब्रिटिश बुलाते थे
जमुना, बहती थी वहां अब एक व्यस्त राजमार्ग बन चुका है."
वो आगे लिखते हैं, "दिल्ली के रिज इलाके, जहां निकोल्सन ने हमले के लिए बड़े धीरज
के साथ इंतजार किया था, ने शहरीकरण का उसी तरह विरोध किया है जिस तरह से
उसने 1857 की गर्मियों में लंबे गतिरोध के दौरान डेरा डाले ब्रिटिश सैनिकों
को बचाया था."
"जैसे ही मैंने रिज क्षेत्र में अपना रास्ता तय करना शुरू किया तो बंदरों के हमले का एकमात्र खतरा सामने आया जो रास्ते की
झाड़ियों में छिपे थे. वहां से एक टैक्सी में सवार होकर मैं थोड़ी दूर
स्थित अलीपुर रोड के उस मार्ग पर गया जिस पर 14 सितंबर की सुबह निकोल्सन ने अपने जवानों के साथ कूच किया था."
"कुदसिया बाग का हिस्सा, जहां
धावा बोलने वाली टुकड़ियों के कॉलम बनाए गए थे, आज भी मौजूद हैं.
लेफ्टिनेन्ट रिचर्ड बार्टर ने शहर की दीवार से दूर होते समय गुलाब की खुशबू के साथ बंदूकों से निकली सल्फर की गंध महसूस की थी."
"ये देखकर हैरत हुई कि 160 साल बाद आज भी वहां गुलाब के पौधे हैं, शायद इसी स्थान पर
बेहद उत्तेजित जवानों ने हमला शुरू करने से पहले एक दूसरे के लिये अच्छे
नसीब की दुआ की होगी."
"इस उद्यान के सामने शहर की दीवार और कश्मीर
बैस्टियन के अवशेष, जिन पर निकोल्सन और उसके जवान चढ़े थे, अभी भी हैं. एक बार फिर बंदरों ने उस वक्त छीना झपटी शुरू कर दी और मैं शहर की नई मेट्रो
रेलवे लाइन के शेड की छाया में खड़ा देखता रहा."
"इसके बाद, मैं कश्मीरी गेट आया. दुश्मन को दीवार के किनारे से खदेड़ने के लिए वापस लौटने
से पहले निकोल्सन ने इसी जगह से शहर की ओर कूच किया था. हालांकि यहां
परिवहन टर्मिनल के बढ़ते दबाव के बावजूद कश्मीरी गेट को अभी भी संरक्षित रखा गया है और हाल ही में इसके आसपास लैंडस्केपिंग की गई है."
इसके
आगे दीवार गायब हो गई है, लेकिन लोथियन रोड के साथ कुछ दूरी तय करना इस बात
का संकेत था कि मैं अभी भी निकोल्सन के पदचिन्हों पर ही हूं. वहां दाहिनी
ओर निकोल्सन रोड थी जिस पर एक ओर दुकानें और मकान बन गये थे जबकि दूसरी ओर दीवार का एक दूसरा हिस्सा था."
"आधे मील से अधिक की दूरी पर इसमें
इतना मामूली बदलाव आया है कि सहज ही ये महसूस होता है कि निकोल्सन खुद यहां
हैं और मानो वो दीवार के साथ ही चल रहे हैं. लेकिन तभी आधुनिक दिल्ली सामने आने लगी."
"निकोल्सन के निधन के बाद के दशक में निर्मित
पुरानी दिल्ली स्टेशन की ओर जाने वाली रेलवे लाइन पर अचानक ही निकोल्सन रोड
खत्म हो गई. थोड़ा सा रास्ता बदलकर रेलवे के दूसरी ओर जाने पर मैं वहां
पहुंच गया जहां कभी काबुल गेट था."
"इसके दक्षिण में दीवार के साथ
साथ नया बाज़ार रोड चल रही है मगर निकोल्सन को कहां गोली मारी गई थी? बर्न
बैस्टियन और लाहौरी गेट अब वजूद में नहीं थे. उनकी दिशा में चलने पर उस
स्थान का पता लगाना असंभव था. नया बाजार की संकरी लेन में बैठे लोग निकोल्सन के नाम से अनजान थे और वे मदद करने में सक्षम नहीं थे."
"हमेशा से ही ये इतना मुश्किल नहीं था, लार्ड कर्जन ने 20वीं सदी में पहले
वायसराय के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीरी गेट के पास से इसी तरह
की यात्रा शुरू की थी. काबुल गेट से करीब 80 गज की दूरी पर उन्हें दीवार पर एक पट्टिका मिली थी."
"पट्टिका पर वो जगह चिन्हित थी जहां ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन 14 सितंबर, 1857 के हमले में बुरी तरह जख्मी हो गए थे."
दिल्ली
में ये दीवार और पट्टिका 1940 के दौर में ली गई तस्वीरों में देखी जा सकती है परंतु अब दोनों को ही ध्वस्त कर दिया गया है. हालांकि यादें अभी भी
बाकी हैं.
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