Tuesday, August 20, 2019

चांद पर भारत की नींव रखने वाले डॉक्टर विक्रम साराभाई, जो परमाणु बम के ख़िलाफ़ थे- विवेचना

12 अगस्त, 1919 को जब अहमदाबाद के कपड़ा मिल मालिक अंबालाल साराभाई के घर एक लड़का पैदा हुआ तो सबका ध्यान सबसे पहले उसके कानों की तरफ़ गया.
वो कान इतने बड़े थे कि जिसने भी देखा उसी ने कहा कि वो गांधीजी के कानों से बहुत मिलते हैं.
अंबालाल के करीबी लोगों ने मज़ाक भी किया कि इन कानों को पान की तरह मोड़ कर उसकी गिलोरी बनाई जा सकती है. इस लड़के का नाम विक्रम अंबालाल साराभाई रखा गया.
उस समय साराभाई के अहमदाबाद वाले घर में भारत के चोटी के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक जैसे जगदीश चंद्र बसु और सीवी रमण, मशहूर इतिहासकार जदुनाथ सरकार, राजनेता और वकील बुलाभाई देसाई, जानी मानी नृत्यांगना रुक्मणी अरुंदेल और दार्शनिक गुरु जिद्दू कृष्णामूर्ति जैसे लोग ठहरा करते थे.
साल 1920 में रविंद्र नाथ टैगोर अहमदाबाद आए थे
विक्रम साराभाई की जीवनी लिखने वाली अमृता शाह बताती हैं, "टैगोर को किसी शख़्स के माथे को देख कर उसके बारे में भविष्यवाणी करने का शौक़ था. जब नवजात विक्रम को उनके सामने ले जाया गया तो उन्होंने उनके चौड़े और असमान्य माथे को देख कर कहा था, "ये बच्चा एक दिन बहुत बड़े काम करेगा."
और साराभाई के घर पर ही रुके थे.
बाद में जब विक्रम साराभाई ने केंब्रिज में पढ़ने का फ़ैसला किया तो टैगोर ने उनके लिए एक 'रिकमंडेशन लेटर' लिखा था.
विक्रम साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई आज भारत की जानी-मानी नृत्यांगना हैं.
वो बताती हैं कि उन्होंने अपने पिता को हमेशा अपने विचारों में मग्न देखा. मशहूर चित्रकार रोडां की कलाकृति 'थिंकर' की तरह उनका हाथ हमेशा सोच की मुद्रा में उनकी ठुड्डी पर रहता था.
मल्लिका याद करती है, "मेरे पिता ज़मीन से जुड़े हुए शख़्स थे. हर एक की बात वो बहुत ध्यान से सुनते थे. हमेशा सफ़ेद खादी का कुर्ता पाजामा पहनते थे. जब बहुत ज़रूरी होता था तो वो सूट पहनते थे. लेकिन उसके ऊपर जूते की बजाय कोल्हापुरी चप्पल पहना करते थे.वो हम दोनों बच्चों पर बहुत गर्व करते थे."
"वो बहुत लोकतांत्रिक इंसान थे. मुझे याद है एक बार वो कार ख़रीदना चाह रहे थे. उन्होंने हम सब से पूछा कि किस रंग की कार ली जाए. मैं तीन साल की थी."
"मैंने हठ पकड़ ली कि अम्मा की कार गुलाबी रंग की होगी. उन्होंने और मेरी मां ने पूरे तीन दिनों तक मुझे समझाया और जब मैं मानी तभी उन्होंने काले रंग की फ़िएट कार ख़रीदी."
कैंब्रिज से वापस लौटने के बाद विक्रम साराभाई 'इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस' बंगलौर चले गए, जहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमण की देखरेख में अपना शोध जारी रखा.
वहीं, उनकी मुलाकात महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से हुई, जिन्होंने उनकी मुलाकात मशहूर नृत्यांगना मृणालिनी स्वामीनाथन से कराई जो बाद में उनकी पत्नी बनीं.
मल्लिका साराभाई याद करती हैं, "होमी भी अच्छी चीज़ों के पारखी थे. कलाकार थे और स्वयं चित्र बनाया करते थे. मेरे पिता और उनमें बहुत दोस्ती थी. वो अक्सर मेरे पिता को चिढ़ाते थे कि तुम इतने ख़ूबसूरत भारतीय कपड़ों में क्यों घूमते हो ? एक वैज्ञानिक की तरह कपड़े क्यों नहीं पहनते ? मेरी मां और भाभा बैडमिंटन पार्टनर थे. उन्होंने ने ही मेरे पिता को पहली बार मेरी मां से मिलवाया था."
दिलचस्प बात ये है कि शुरू में विक्रम और मृणालिनी एक दूसरे के प्रति आकर्षित नहीं थे.
अमृता शाह बताती हैं, "मृणालिनी और विक्रम जब पहली बार मिले तो उन्होंने एक दूसरे को पसंद नहीं किया. मृणालिनी टेनिस शॉर्ट्स मे थी और विक्रम को उनकी ये पोशाक रास नहीं आई."
"बाद में वो बहुत शिद्दत से भरतनाट्यम सीखने लगीं. वो इस नृत्य से इस हद तक जुड़ी हुई थी कि उन्होंने अविवाहित रहने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन विक्रम ने उनसे मिलना-जुलना शुरु कर दिया. वो साथ साथ भुट्टा खाते थे."
दोनों ऊपरी तौर से तो कह रहे थे कि उनका शादी का कोई इरादा नहीं है, लेकिन दोनों धीरे-धीरे उसी तरफ़ बढ़ रहे थे. उनकी शादी पहले वैदिक रीति से हुई फिर उन्होने सिविल मैरेज भी की. शादी के दिन मृणालिनी ने सफ़ेद खद्दर की साड़ी पहन रखी थी और उनके शरीर पर ज़ेवरों की जगह फूल थे. विक्रम के अनुरोध पर मृणालिनी और उनकी एक दोस्त ने रामायण के हिरण वाले दृश्य पर एक नृत्य किया था."
जिस दिन उनकी शादी हुई उसी दिन वो ट्रेन से बंगलौर से अहमदाबाद के लिए रवाना हुए. वो भारत छोड़ो आंदोलन के दिन थे. आंदोलनकारियों ने हर जगह रेल की पटरियां उखाड़ दी थीं जिसकी वजह से जो यात्रा 18 घंटे में पूरी होनी थी, उसे पूरा होने में पूरे 48 घंटे लगे. इस तरह विक्रम और मृणालिनी ने अपना हनीमून ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास के कूपे में मनाया.
जब विक्रम अपनी नई-नवेली पत्नी के साथ अहमदाबाद अपने घर पहुंचे तो वहां उदासी छाई हुई थी, क्योंकि विक्रम की बहन मृदुला आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के कारण 18 महीने की जेल की सज़ा काट रही थीं.
अंबालाल साराभाई ने प्रशासन से अनुरोध किया कि उन्हें छोड़ दिया जाए ताकि वो अपने भाई और भाभी से मिल सकें. गवर्नर रॉजर लमले इसके लिए तैयार भी हो गए लेकिन मृदुला ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया.
"मृणालिनी उन्हें बांगला गीत सुनाती थीं जो उन्होंने शांति निकेतन के अपने प्रवास के दौरान सीखे थे. विक्रम उन्हें कालिदास के उद्धरण सुनाते थे."

Thursday, July 25, 2019

لا ينحصر الأمر بالهبوط على القمر فقط، بل أن بعضهم يستعد من الآن

لماذا قررت الولايات المتحدة إنشاء محطة فضائية تسبح في مدار حول القمر؟ يبدو هذا السؤال مشروعا، خصوصا إذا علمنا بأن رواد الفضاء تمكنوا من إنجاز مهماتهم قبل 50 سنة دون الحاجة إلى محطة كهذه.
يقول بيت مغراث، مدير المبيعات العالمية والتسويق في فرع إستكشاف الفضاء في شركة بوينغ "إن الغرض من إنشاء هذه المحطة - البوابة هو استخدامها كمحطة متوسطة للوصول إلى القمر ومن ثم إلى المريخ".
يمكن وصف جون شانون بأنه مهندس هذه البوّابة. فعندما كان يعمل في ناسا حوالي العام 2011، كُلّف بالتفكير في الهدف التالي للاستكشاف الفضائي البشري. يقول "جلستُ وراجعتُ كل المهمات التي خَططت ناسا لها في السنوات العشرين الماضية. بلغ ارتفاع كومة الوثائق التي راجعتها أربعة أقدام".
بدأ شانون تركيز نظره على الأفكار والمشاريع المجدية والقابلة للتطبيق. ويقول "الأمر الذي بدا معقولا جدا هو القدرة على إنشاء محطة فضائية صغيرة الحجم يشغلها روّاد تتخذ لها مدارا حول القمر. تتيح البوابة لأطقم الروّاد فرصة الاستعداد قبل الهبوط إلى سطح القمر، كما تسمح بتسيير العربات على سطح القمر عن بعد. ويمكنها أيضا أن تستخدم ملاذاً آمناً إذا وقع أي طارئ خلال إحدى المهمات".
كانت رحلات أبولو تأخذ كل المعدات الضرورية لتنفيذ مهماتها معها إلى القمر. وكانت ناسا تضع روّادها في مدارات حول القمر تسمى مسارات العودة الحرة يتمكن بواسطتها الروّاد من العودة إلى الأرض بأمان إذا وقع أي طارئ كأن تصاب محركات المركبة التي من المفروض أن تقلهم إلى مدار حول القمر بعطل ما. ولكن هذا النظام حدد مواقع هبوط الروّاد بحزام ضيق يقع قرب خط استواء القمر.
أما البوابة القمرية فسوف تحلق في مدار أعلى، وستتخذ لها مسارا بيضوي الشكل يقال له المدار القمري شبه المستقيم (NRHO)، مما يمكن ناسا من إنزال الروّاد في أي موقع ترتأيه على سطح القمر.
ويقول تشيمبرز "يعني هذا أنه عليك تجهيز مرحلة الهبوط على مسافة أبعد من القمر لكي تتمكن من أن تقرر ما إذا تريد التوجه إلى أحد القطبين أو إلى خط استواء القمر".
لن تكون المحطة-البوابة جاهزة للعمل بحلول موعد الرحلة المقرر في عام 2014، ولكن يمكن لمركبة أورايون أن تلتحم بنسخة مصغرة وأقل تجهيزا من النسخة النهائية من المحطة تتكون من وحدة دفع وقمرة صغيرة للطاقم.
ويقول جون شانون إنه "في نهاية المطاف، ستصبح المحطة-البوابة مكانا تجمع فيه كل الأمور اللوجستية التي تحتاجها مركبة متوجهة إلى المريخ".
ولكن موضوع إنشاء البوابة القمرية ما زال يثير الكثير من اللغط والجدل. فالدكتور روبرت زوبرين، وهو مؤلف كتاب عنوانه "الحجة لصالح استكشاف الفضاء"، يرى أن المشروع يشكّل توقفا غير ضروري في الطريق إلى القمر، ويصفه بأنه مثل "حاجز مداري لجباية الأجور".
أما جون لوغسدون من جامعة جورج واشنطن فيقول "إذا كان هدفك الوحيد هو الهبوط في قطب القمر الجنوبي، فلا أعتقد في هذه الحالة أن ثمة ضرورة لوجود البوابة. ولكن الخطة الموضوعة تنص على إجراء هبوط أولي على سطح القمر في عام 2014 على أن يتحول البرنامج إلى برنامج مستدام بحلول عام 2028 لاستكشاف القمر ومن ثم المريخ. إذا كانت هذه هي الخطة، سيصبح وجود البوابة أمرا حيويا".
يزعم كثيرون أن الهبوط على القمر كان الحدث المميّز في القرن العشرين. ففي العشرين من تموز / يوليو 1969، كان الرائدان نيل آرمسترونغ وأدوين (باز) ألدرين يقتربان من سطح القمر بسرعة بمركبتهما. ولأسباب غير معروفة، كانت المركبة تحيد عن مسارها وتتوجه إلى موقع يبعد عن موقع الهبوط المخطط له بأربعة أميال.
وفي الأمتار الـ 610 الأخيرة من عملية الهبوط الآلية، ألقى آرمسترونغ نظرة من خلال شباك المركبة ورأى أنها تتوجه صوب حفرة قمرية كبيرة تحيطها صخور لا يقل حجم الواحدة منها عن حجم السيارة. خلاصة القول إن كارثة كانت ستحصل لو هبطت المركبة في ذلك الموقع.
ولذا، وعندما هبطت المركبة إلى ارتفاع 152 متراً فقط عن السطح، أمسك آرمسترونغ بزمام السيطرة عليها وقادها كما تقاد الطائرات المروحية. توجه آرمسترونغ بالمركبة إلى منطقة سهلية مستوية حيث هبط بها بأمان متجاوزا بذلك الحفرة القمرية وصخورها الكبيرة.
ولكن مما لاشك فيه أن عمليات الهبوط المستقبلية ينبغي أن تكون أكثر دقة وأمانا.
بهذا الصدد، يقول كين غابرييل، المدير التنفيذي لمختبر دريبر بمدينة بوسطن بولاية ماساشوسيتس "ستحتاج بلا شك إلى أنظمة هبوط آلية أكثر كفاءة ودقة، أنظمة تمكن المركبات من تتبع التضاريس وتمكن قائدها من مشاهدة ما تقوم به فوريا من خلال أجهزة تصوير".
لا ينبغي لك أن تعرف مكانك بالضبط فحسب، بل ينبغي أيضا أن تقدّر - بدقة تبلغ أجزاء المتر - المكان الذي تتوجه إليه وكيف يمكنك تجنب العقبات التي تعترض طريقك. بعبارة أخرى، علينا تمكين نظام السيطرة الآلية المركّب في مركبة الهبوط من تنفيذ الأعمال التي كان آرمسترونغ يقوم بها بعينيه وعقله ويديه عندما كان يهبط على سطح القمر.
ستكون عملية الهبوط عند قطب القمر الجنوبي مثيرة حقا. وعندما يخرج روّاد المركبة منها، قد يكونون يرتدون بذلات فضاء تشبه نموذج Z-2 التجريبي. هذه البذلة مصممة بحيث تمنح مرتديها قدرا أكبر من الحرية في الحركة من سابقاتها مما يتيح لهم التسلق والنزول والانحناء لجمع الصخور والأحجار.
وقد تكون عملية الإنطلاق من سطح القمر محفوفة بالمخاطر أيضا. إذ يقول الدكتور شيموس توهي الذي يعمل في مختبر دريبر "عندما تنطلق من الأرض، فإنك إنما تنطلق من قاعدة إطلاق ثابتة ومعروفة".
ويمضي للقول إنه "على القمر، يعتمد كل شيء على المكان الذي هبطت فيه والوضع الذي اتخذته المركبة عند هبوطها".
ربما تلخّص مركبة الهبوط التي ستستخدم في مهمة 2024، والتي لم يكتمل بناؤها بعد، بشكل أفضل من أي عنصر آخر من عناصر الرحلة مدى القلق الذي يساور العاملين في المشروع إزاء قرار تسريع العمل فيه. إذ لا توجد بعد أي من المعدات الضرورية، ولم يتضح كيف سيتم اختبارها قبل حلول عام 2024.
ولكن روبرت زوبرين واثق من أن فترة خمس سنوات ونصف السنة تكفي لإنجاز بناء مركبة الهبوط واختبارها.
إلا أنه يضيف أن "مشروع البوابة القمرية يحرم عملية تطوير مركبة الهبوط من الأموال التي تحتاجها، والمركبة هي العنصر الحاسم إذا أردنا الهبوط على سطح القمر".

Wednesday, June 26, 2019

रामपुर के एसपी अजयपाल शर्मा ने कथित बलात्कारी को गोली मारी?

उत्तरप्रदेश के रामपुर में छह साल की बच्ची के कथित बलात्कारी को मुठभेड़ में गोली मारने के मामले में रामपुर के पुलिस अधीक्षक अजयपाल शर्मा की चर्चा सोशल मीडिया पर ख़ूब हो रही है.
क तरफ़ तो लोग इसे उनकी बहादुरी क़रार दे रहें हैं तो दूसरी तरफ़ बहुत सारे लोग इस मामले में कई सवाल भी उठा रहे हैं, जो न सिर्फ़ पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं बल्कि राज्य की क़ानून व्यवस्था को भी घेरे में डाल रही है.
क़रीब डेढ़ महीने पहले छह साल की एक बच्ची की बेरहमी से हत्या करके शव को कहीं फेंक दिया गया था. आशंका ज़ाहिर की गई कि पहले बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई.
इस मामले में नाज़िल नाम के जिस शख़्स को पुलिस मुख्य अभियुक्त मान रही थी, दो दिन पहले पुलिस के साथ उसकी मुठभेड़ हुई जिसमें बताया जा रहा है कि एसपी अजयपाल शर्मा ने नाज़िल को गोली मार दी जो कि उसकी टांगों पर लगी. बाद में नाज़िल को पुलिस ने हिरासत में लेकर अस्पताल भेज दिया.
लेकिन सोशल मीडिया पर अजयपाल शर्मा की तस्वीरों के साथ यही बात वायरल हो रही है कि नाज़िल को गोली अजयपाल शर्मा ने ही मारी. इसके लिए अजयपाल शर्मा की जमकर तारीफ़ भी हो रही है. गोली अजयपाल शर्मा ने ही मारी या फिर किसी और ने, इस बारे में जानने के लिए अजयपाल शर्मा से कई बार संपर्क किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.
सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि पुलिस ने 'पीड़ित लड़की के परिवार को न्याय दिलाया है', 'उनके मन में थोड़ा सुकून मिला है', 'इससे बदमाशों के मन में ख़ौफ़ पैदा होगा' 'इससे अपराधों में कमी आएगी' इत्यादि. सोशल मीडिया पर तो कई लोग उन्हें भगवान के समकक्ष रख रहे हैं तो कई उन्हें सिंघम का अवतार बता रहे हैं.
लेकिन कई लोग इस पर सवाल भी उठा रहे हैं. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके पूर्व आईपीएस अधिकारी एके जैन कहते हैं कि यदि मुठभेड़ के दौरान अभियुक्त ने गोली चलाई और पुलिस ने आत्मरक्षा में उसे गोली मारी तो इसमें कोई ग़लत नहीं है लेकिन सिर्फ़ रेप और हत्या का अभियुक्त मानकर गोली मार दी तो ये बिल्कुल ग़लत है.
बीबीसी से बातचीत में एके जैन का कहना था, "जैसा मैंने ख़बरों में पढ़ा है कि उस व्यक्ति ने पुलिस पर उस वक़्त गोली चलाई जब पुलिस उसे गिरफ़्तार करने की कोशिश कर रही थी. ऐसे में अपने बचाव में पुलिस अधिकारी का गोली चलाना पूरी तरह से न्यायसंगत है लेकिन रेप के एक अभियुक्त पर गोली चला देना जिसका कि पहले से कोई आपराधिक इतिहास भी न रहा हो तो ये ठीक नहीं है."
एके जैन कहते हैं कि अभियुक्त की तो छोड़िए यदि आरोप साबित भी हो गए हों तो भी गोली चलाने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि सज़ा देना तो न्यायालय का काम है, पुलिस का नहीं.
वहीं पुलिस विभाग के एक मौजूदा अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर इस कार्रवाई को पूरी तरह से 'पब्लिसिटी स्टंट' क़रार देते हैं.
उनके मुताबिक़, "ये बात समझ से परे है कि एक अभियुक्त को किसी एक थाने की पुलिस पकड़ने गई है और उस पर गोली पुलिस अधीक्षक चला रहे हैं. किसी मुठभेड़ का नेतृत्व पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी का करना कोई सामान्य बात नहीं होती है और ये मामला इतना बड़ा और मुश्किल नहीं था कि इसमें एसपी जैसे अधिकारी को लगना पड़ता."
हालांकि पुलिस अधिकारी की इस कार्रवाई की प्रशंसा करने वाले सोशल मीडिया पर ही नहीं बल्कि उसके अलावा भी तमाम लोग हैं. लखनऊ में अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार और पिछले क़रीब डेढ़ दशक से क्राइम की रिपोर्टिंग कर रहे विवेक त्रिपाठी कहते हैं कि एसपी अजयपाल शर्मा ने कुछ भी ग़लत नहीं किया. उनके मुताबिक़ ऐसे जघन्य कृत्य के लिए तो और बड़ी सज़ा दी जानी चाहिए थी.
विवेक त्रिपाठी कहते हैं, "पुलिस का इतना भय अपराधियों में रहना चाहिए अन्यथा अपराध रोकना आसान नहीं होगा. हम लोग क्राइम की ख़बरें कवर करते-करते अपराध और अपराधियों के मनोविज्ञान को भली-भांति समझते हैं. क़ानून और पुलिस का भय यदि ख़त्म हो गया तो अपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे."
उत्तर प्रदेश में डीजीपी रह चुके एक अन्य रिटायर्ड पुलिस अधिकारी सुब्रत त्रिपाठी भी सिर्फ़ एक अभियुक्त को गोली मारने के पक्ष में नहीं हैं लेकिन मुठभेड़ में किसी को भी गोली लग जाने को वे बहुत आश्चर्यजनक घटना नहीं मानते हैं.
वहीं लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान इस घटना को राज्य की 'बिगड़ती क़ानून व्यवस्था' और 'बेलगाम पुलिस' का नतीजा बताते हैं.
वो कहते हैं, "जिस व्यक्ति पर पुलिस को संदेह था, उसके संदेह का क्या आधार था ये किसी को नहीं पता है. उसे पकड़ने की बजाय गोली मारकर पुलिस अपनी नाकामी छिपा रही है. जबकि सच्चाई ये है कि डेढ़ महीने से लापता बच्ची के बारे में उसे तब तक कोई जानकारी नहीं मिली जब तक कि उसकी लाश की सूचना दूसरे लोगों ने नहीं दी. यह अकेली घटना नहीं है बल्कि राज्य में आए दिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं."
मुठभेड़ को लेकर यूपी पुलिस पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. हालांकि रिटायर्ड डीजीपी एके जैन के मुताबिक़ पहले के मुक़ाबले अब मुठभेड़ की घटनाएं बहुत कम होती हैं.
उनका कहना है, "मैंने जब सत्तर के दशक में नौकरी शुरू की थी, उस वक़्त सैकड़ों मुठभेड़ें हर साल होती थीं और कम से कम दो-ढाई सौ अपराधी मारे भी जाते थे. डकैती उन्मूलन अभियान में कितने डकैत मारे गए. लेकिन नब्बे के दशक के बाद मुठभेड़ों में इसलिए कमी आई क्योंकि मानवाधिकार आयोग, जांच एजेंसियों और सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती के बाद पुलिस अधिकारियों में भी मुठभेड़ को लेकर डर पैदा हो गया."

Friday, June 14, 2019

يتبادل المستخدمون صوراً لمشاريع التصميم الداخلي في بيوتهم

وتقول غلين إن مُربي النحل إما غير قادرين على توسيع نشاطهم أو غير راغبين في ذلك نظرا لارتفاع تكلفة نقل العسل إلى الأسواق، واضطراب الإنتاج مثلما حدث قبل عامين عندما ضربت موجة جفاف كينيا.
وقد بدأت تقنيات جديدة تلوح في الأفق لتطوير هذه الصناعة التي تعتمد على طرق تقليدية.
ويتحدث تيرنس تشمباتي، وهو من زيمبابوي ويعيش في أوغندا، عن عدم توافر البيانات المتعلقة بصناعة العسل، وقد دفعه ذلك للعمل على تأسيس شركة "هاتشي هايف" لجمع المعلومات والأخذ بتوجه تقني للنهوض بالمناحل يشمل تتبع النحل لرصد المسافات التي يقطعها والزراعات المفيدة وبالتالي تشجيع المزارعين على غرس الأشجار المطلوبة قرب المناحل.
وتتابع الشركة عبر مناحلها الذكية عن بعد موقع الأعشاش ودرجة الرطوبة والحرارة والضوضاء والوزن فيما يعمل فريق على رصد المبيدات.
ونجحت "هاتشي هايف" في تجاوز الطرق التقليدية وبدأت إطلاق تجربتها في مائتي موقع.
وسوف تستفيد الكثير من المناحل من توافر بيئة معلوماتية على نحو يعزز الاستثمار ويقيس المكاسب مقابل الصعوبات التي تشمل مخاطر تهدد الملقحات البرية.
وعلى صعيد التوجه نحو جهود الحفاظ على البيئة لتصبح أكثر ربحية، قد تتصدر المناحل في منطقة أفريقيا جنوب الصحراء ركب الصناعات الأخلاقية التي تعتمد، إلى جانب تحقيق ربح، على حماية ملقحات النباتات، فضلا عن حماية الغابات وتوفير دخل مستدام، إلى جانب توفر فرص عمل جيدة.
في كل أسبوع، تسلط سلسلة حلقات "ذا بوس" التي تقدمها بي بي سي الضوء على سيرة رجل أعمال مختلف في شتى أرجاء العالم. وتتحدث حلقة هذا الأسبوع عن أدي تاتاركو، المديرة التنفيذية والمشاركة في تأسيس موقع "هاوز" الأمريكي المتخصص في أعمال تجديد المنازل.
عندما قررت أدي تاتاركو وزوجها تجديد منزلهما في ولاية كاليفورنيا في عام 2009، لم يجدا الأمر بالسهولة التي كانا يتوقعانها.
وتقول تاتاركو "كنا متحمسين بالفعل لتزيين المنزل وتجديده، وكانت لدينا الكثير من الأفكار للقيام بتلك المهمة، لكن عملية التنفيذ كانت بالغة الصعوبة. وكانت عملية البحث عن مهندسين معماريين ومصممين لديهم نفس الرؤية التي لدينا مضيعة للوقت".
لجأ الزوجان إلى الإنترنت طلبا للمساعدة، لكنهما وجدا شحا في المواقع الإلكترونية التي تقدم المساعدة وتوحي بالأفكار، فتولدت لديهما فكرة تأسيس موقع "هاوز".
ويقدم الموقع، القائم على ما يقدمه المتابعون من إسهامات بالأفكار والاقتراحات، مقالات وصوراً يرسلها مهندسون معماريون ومتخصصون في التصميم الداخلي، إضافة إلى نصائح تتعلق بشراء منتجات معينة.
ويبلغ عدد مستخدمي موقع "هاوز" اليوم 40 مليون مستخدم. وتشير أنباء إلى أن قيمته وصلت إلى أربعة مليارات دولار، وذلك بالرغم من أن أهداف الزوجين عندما أطلقاه قبل عشر سنوات كانت متواضعة.
ويستطيع مستخدمو الموقع الاستفادة من الأفكار المبتكرة، فضلا عن شراء منتجات والتعاقد مع خبراء.
وتقول تاتاركو، البالغة من العمر 46 عاما: "أردناه في الواقع أن يكون موقعا صغيرا، حيث لم نرغب في فقدان شعور المجتمع الصغير. لم نفكر على الإطلاق في التوسع خارج كاليفورنيا".
تولت تاتاركو وزوجها ألون كوهين، البالغ من العمر 48 عاما، في البداية إدارة الموقع كمشروع جانبي بالإضافة إلى عملهما الأساسي بنظام الدوام الكامل، إذ كانت هي تعمل في شركة استثمارية، بينما كان يعمل هو بمجال الهندسة في شركة "إي باي" للتجارة عبر الإنترنت.
كان هناك 20 مستخدما فقط مع إطلاق الموقع، جميعهم أولياء أمور تلاميذ في مدارس أبنائهما، إلى جانب مجموعة من المصممين والمهندسين المعماريين من منطقة خليج سان فرانسيسكو، والذين كانوا يعرضون خدماتهم.
وحقق الموقع نموا سريعا في عدد المستخدمين، لاسيما عندما بدأ المتخصصون توصية الزبائن بمتابعة موقع "هاوز".
وتقول تاتاركو "تلقينا بعد نحو ستة أشهر طلبات من نيويورك وشيكاغو تسأل عن إمكانية تدشين أقسام خاصة بهم على الموقع".
وتضيف "وفجأة بلغ عدد مستخدمي هذا الموقع المجتمعي الصغير 350 ألفا".
واستطاع الزوجان في عام 2010 تأمين أول مشروع استثماري لهما باقتراض مليوني دولار من أورين زييف، وهو ممول ينشط في وادي السيليكون. وترك الاثنان وظيفتيهما للتفرغ للعمل في المشروع، واستخدما المال المقترض في تعيين أول فريق عمل لديهما.
وتقول تاتاركو إن العثور على طاقم من الموظفين المناسبين كان من بين التحديات الكبرى.
وتضيف "أجرينا مقابلات شخصية لفترة طويلة مع كل متقدم للعمل، وكان نصف وقتنا مكرسا للبحث عنهم. كنا على دراية بأن التعاقد مع موظفين مناسبين يحملون نفس رؤيتنا يعد مسألة بالغة الأهمية ومفتاحا لعمل الموقع".
ويتقاضى "هاوز"، المتاح بالمجان لأصحاب المنازل والمتخصصين في العمارة والتصميم الداخلي، عمولة نسبتها 15 في المئة عن بيع منتجات من خلال قسم التسوق الخاص به، كما يعرض على منصته إعلانات ويبيع منازل وعقارات متميزة لحساب متخصصين في مجال التصميم والتجديد العقاري.
ويعتقد تشارلز بيتيس، رئيس شركة الهندسة المعمارية البريطانية "جيباد لندن"، أن موقع "هاوز" يعد مشروعا ناجحا لأنه يتيح فرصة أمام المستخدمين للاستفادة من "أفكار مبتكرة متخصصة" لتجديد المنازل.
ويضيف "في الماضي كانت المصادر الرئيسية للأفكار بالنسبة للراغبين في تجديد منازلهم تركز على مجلات التصاميم الداخلية وبرامج التلفزيون ومنازل الآخرين. أما اليوم، فتوجد الكثير من الأفكار المتاحة على الإنترنت".
ويستطرد "بيد أن هذه الصور والتصاميم الملهمة بأفكار قد تكون كثيرة جدا لدرجة تثير الحيرة، لكن منصات مثل (هاوز) تقدم عرضا منسقا لبعض أفضل مشروعات تجديد المنازل".
قرر كوهين وتاتاركو في عام 2013 توسيع نطاق مشروعهما في الخارج بعد أن أدركا أن ثلث مستخدمي "هاوز" تقريبا هم من خارج الولايات المتحدة، فدشن الزوجان موقعا في البداية في أوروبا، ثم في آسيا، ليصبح اليوم نصف عدد المستخدمين من خارج الولايات المتحدة.
كما افتتح "هاوز" ستة مكاتب على مستوى العالم، في أماكن مثل لندن وبرلين وسيدني.
وساعد هذا النمو في جمع ما يزيد على 600 مليون دولار من مستثمرين حتى الآن، لكن يقال إن الشركة لم تحقق أرباحا بعد.
وكانت الشركة قد أعلنت في يناير/ كانون الثاني الماضي أنها بصدد تقليص نحو 10 في المئة من موظفيها البالغ عددهم 2000، وهو ما يعني إنهاء عقود 110 موظفين من بريطانيا وألمانيا، فضلا عن 70 موظفا في الولايات المتحدة.
في الوقت نفسه، أشارت تقارير إلى أن الشركة توسعت بسرعة كبيرة جدا على نحو أثار الشكوك بشأن ما إذا كانت تمتلك استراتيجية عمل سليمة.
وقال متحدث باسم الشركة لمدونة "تيك كرانش" الإلكترونية "أعدنا هيكلة وتنظيم القوة العاملة لدينا على مستوى العالم بغية مضاعفة العمل في المناطق ذات التأثير الأكبر في عمل (هاوز). توجد دائماً صعوبة في إعادة الهيكلة أثناء مراحل النمو، مع الأخذ في الاعتبار بتأثير ذلك على حياة الناس".
وتقول الشركة، على الرغم من الانتكاسة، إن نشاطها التجاري لا يزال قويا. وهناك شائعات تتحدث عن اعتزامها تسجيل أسهمها في سوق للأسهم.
وتواصل الشركة تحديث خدماتها، حيث طرحت أداة متطورة تتيح رؤية واقعية من خلال تطبيقها الإلكتروني الخاص لما سيبدو عليه الأثاث والتصاميم المختلفة داخل منزلك.
كما تمثل قناة "هاوز" التلفزيونية التي تعرض مقاطع فيديو لتجديد منازل المشاهير على الإنترنت، طفرة كبيرة. وهي فكرة كان طرحها الممثل أشتون كوتشر، أحد المستثمرين في هاوز، والذي ظهر في الحلقة الأولى من هذه الفيديوهات.

Monday, May 27, 2019

المجلس العسكري السوداني "صمام أمان" أم "ثورة مضادة"؟

علقت صحف عربية بنسختيها الورقية والإلكترونية على أول زيارة يقوم بها رئيس المجلس العسكري السوداني عبد الفتاح البرهان لمصر منذ توليه منصبه، منطلقا منها إلى الإمارات، والتي تزامنت مع زيارة قام بها نائبه الأول محمد حمدان دقلو (حميدتي) للسعودية.
ورأى كُتّاب أن هذه الزيارات تعكس توجه المجلس العسكري السوداني نحو المحور الذي تقوده السعودية والإمارات ومصر والبحرين في مقابل قطر وتركيا، بينما رأى آخرون أن المجلس يقود "ثورة مضادة" في السودان.
يقول صلاح الدين مصطفى في "القدس العربي" اللندنية: "مراقبون يرون أن الزيارتين اللتين قام بهما محمد حمدان حميدتي... للمملكة العربية السعودية يوم الخميس ومن بعده رئيس المجلس عبد الفتاح البرهان إلى مصر(السبت)، تشيران إلى أن السودان حسم أمره بالتوجه نحو محور السعودية والإمارات".
ويرى عماد الدين حسين، رئيس تحرير "الشروق" المصرية، أن اختيار البرهان القاهرة كأول محطة له منذ توليه منصبه "إشارة مهمة جدا ينبغي عدم إغفالها لتأسيس علاقات قوية بين البلدين، شرط أن تستقر الأمور أولا بين المجلس الانتقالي وقوى الحرية والتغيير، ويتوصل الجانبان إلى توافق عام يتيح للسودان أن ينطلق للأمام".
ويقول محمد أبو الفضل في صحيفة "العرب" اللندنية إن المجلس العسكري "ارتكز على ما حصده من دعم عربي وأفريقي، وبدأ يزيد من سرعة تحركاته على المسارين، ويرسل إشارات تطمين لقوى إقليمية ودولية منخرطة في مجابهات مصيرية مع العناصر المتطرفة ومكافحة الإرهاب".
ويضيف بأن زيارة البرهان لكل من مصر والإمارات كشفت "عمق العلاقة بين السودان الجديد والفضاء العربي، حيث جاءت بعد زيارة قام بها نائبه الفريق أول محمد حمدان دقلو (حميدتي) للسعودية، بما يؤكد انحياز الخرطوم لتحالف مصر والسعودية والإمارات على حساب محور قطر وتركيا".
ويؤكد الكاتب أن المجلس العسكري "نجح في تسويق نفسه بحسبانه صمام أمان رئيسي للسودان وجيرانه، وأبعده التحلي بالرشد عن الدخول في دوامة خطيرة من التجاذبات، الأمر الذي جعل الفضاء الإقليمي مهيأ لتقديم أنواع جديدة من الدعم السياسي والاقتصادي لإدارة المجلس العسكري على حساب قوى الحرية والتغيير".
وتعليقا على التحية العسكرية التي أداها البرهان للرئيس المصري عبد الفتاح السيسي أثناء زيارة الأول للقاهرة، تقول "القدس العربي" اللندنية إنها "تعبر عن حقيقة ما يطمح إليه المجلس العسكري في السودان بتكرار السيناريو المصري: ركوب ثورة الجماهير وتقديم التنازلات الشكليّة لها... ثم الانقضاض عليها وإعادة النظام القديم مع تغطية إقليمية جديدة يمثّلها حلف 'الثورة المضادة' في مصر والإمارات والسعودية والبحرين".
وتضيف الصحيفة في افتتاحيتها: "على بساطتها الرمزية، تظهر التحيّة العسكرية أن المجلس العسكري صار تحت 'إمرة' حلف 'الثورة المضادة'، التي بدأت بتقديم 'الملاءة' النقديّة اللازمة لدفع أجور جنود القوات المسلحة".
وترى الصحيفة أن إعلان حزب الأمة رفْض المشاركة في الإضراب العام الذي أعلنته قوى الحرية والتغيير يُظهر "تأثير الإمارات التي كانت تستضيف زعيم حزب الأمة الصادق المهدي لسنوات خلت قبل الثورة، وهذا يعني أن 'الثورة المضادة' انتقلت إلى الخطوة الثانية بعد تأمين المجلس العسكري، وهي شق المعارضة".
وفي جريدة "الراكوبة" السودانية، يقول الفاضل عباس محمد علي: "لقد أبدى كل من حميدتي وبرهان ما يشير إلى أنهما ينفذان أجندة أجنبية، وأنهما مشبّعان بالطموح للانفراد بالأمر على طريقة السيسي الذى ورث ثورة 30 يونيو 2013 الشعبية المصرية، وأنهما مثل علي عبد الله صالح يرقصان فوق رؤوس الأفاعي، ويلعبان الروليت مع مناديب الحرية والتغيير".

Tuesday, May 14, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

हालांकि स्टुअर्ट फ्लिन्डर्स ने अपनी किताब में इसका कोई जिक्र नहीं किया है और ये एक तरह से सही भी था.
जॉन निकोल्सन की इस जीवनी में दिल्ली वालों के बारे भी पढ़ना दिलचस्प है जो कभी-कभी उनके मकबरे पर जाते हैं.
एक आयरिश डॉक्टर के पांच बेटों में सबसे बड़े जॉन की प्रतिमा दिल्ली के कश्मीरी गेट से हटाकर बेलफास्ट भेज दी गई.
और अब वो मूर्ति उत्तरी आयरलैंड के डंगैनन शहर की शोभा बढ़ा रही है.
निकोल्सन अपने लोगों के 'डार्क हीरो' थे तो प्रसिद्ध मुल्तानी हॉर्स की टुकड़ी के के जवानों के बीच 'निकल सेन' नाम से मशहूर थे.
ये जवान उनके अंतिम संस्कार के अवसर पर फूट-फूट कर रोये थे और उसकी कब्र की घास अपने हाथों में लेकर उन्होंने लड़ाई में आगे हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था.
इन सैनिकों ने मुल्तान से भी आगे अपने उन स्थानों पर वापस लौटना और 34 साल की आयु में ही प्राणों की आहूति देने वाले अपने दिवंगत कमांडर के सम्मान में शोक मनाना पसंद किया जहां से वे आए थे.
मुल्तान अब पाकिस्तान में है और यहां निकोल्सन की एक और प्रतिमा के स्थापित होने का इंतजार है.
साथी सैनिकों की इसी मोहब्बत ने अनजाने में ही रहस्यमयी पंथ 'निकल सेन' को जन्म दिया.
हालाकि इस बात पर हैरत होती है कि यदि निकोल्सन की ज़िंदगी लंबी होती तो क्या उन्हें इसी तरह की शोहरत हासिल होती और क्या उनके निष्ठुर तौर-तरीकों से उनकी लोकप्रियता पर ग्रहण नहीं लग जाता?
फ्लिन्डर्स कहते हैं कि इस घटना के करीब डेढ़ सदी बाद मुगलों का बसाया ये शहर काफी बदल चुका है.
वो लिखते हैं, "ब्रिटिश हुकूमत के वक़्त के शाहजहांनाबाद शहर और उनके द्वारा बसाई गई नई दिल्ली के बीच हमेशा की तरह ही कम से कम सरकारी इमारतों के इर्द-गिर्द के इलाकों के मामले में अंतर साफ नजर आता है."
"अंग्रेजों के 1947 में भारत छोड़ने के बाद दोनों ही शहरों के बेतरतीब विकास की वजह से दोनो ही बौने लगते हैं. यहां तक कि नदी ने भी अपना रास्ता बदल लिया है. लाल किले के साथ जहां कभी यमुना या जैसा ब्रिटिश बुलाते थे जमुना, बहती थी वहां अब एक व्यस्त राजमार्ग बन चुका है."
वो आगे लिखते हैं, "दिल्ली के रिज इलाके, जहां निकोल्सन ने हमले के लिए बड़े धीरज के साथ इंतजार किया था, ने शहरीकरण का उसी तरह विरोध किया है जिस तरह से उसने 1857 की गर्मियों में लंबे गतिरोध के दौरान डेरा डाले ब्रिटिश सैनिकों को बचाया था."
"जैसे ही मैंने रिज क्षेत्र में अपना रास्ता तय करना शुरू किया तो बंदरों के हमले का एकमात्र खतरा सामने आया जो रास्ते की झाड़ियों में छिपे थे. वहां से एक टैक्सी में सवार होकर मैं थोड़ी दूर स्थित अलीपुर रोड के उस मार्ग पर गया जिस पर 14 सितंबर की सुबह निकोल्सन ने अपने जवानों के साथ कूच किया था."
"कुदसिया बाग का हिस्सा, जहां धावा बोलने वाली टुकड़ियों के कॉलम बनाए गए थे, आज भी मौजूद हैं. लेफ्टिनेन्ट रिचर्ड बार्टर ने शहर की दीवार से दूर होते समय गुलाब की खुशबू के साथ बंदूकों से निकली सल्फर की गंध महसूस की थी."
"ये देखकर हैरत हुई कि 160 साल बाद आज भी वहां गुलाब के पौधे हैं, शायद इसी स्थान पर बेहद उत्तेजित जवानों ने हमला शुरू करने से पहले एक दूसरे के लिये अच्छे नसीब की दुआ की होगी."
"इस उद्यान के सामने शहर की दीवार और कश्मीर बैस्टियन के अवशेष, जिन पर निकोल्सन और उसके जवान चढ़े थे, अभी भी हैं. एक बार फिर बंदरों ने उस वक्त छीना झपटी शुरू कर दी और मैं शहर की नई मेट्रो रेलवे लाइन के शेड की छाया में खड़ा देखता रहा."
"इसके बाद, मैं कश्मीरी गेट आया. दुश्मन को दीवार के किनारे से खदेड़ने के लिए वापस लौटने से पहले निकोल्सन ने इसी जगह से शहर की ओर कूच किया था. हालांकि यहां परिवहन टर्मिनल के बढ़ते दबाव के बावजूद कश्मीरी गेट को अभी भी संरक्षित रखा गया है और हाल ही में इसके आसपास लैंडस्केपिंग की गई है."
इसके आगे दीवार गायब हो गई है, लेकिन लोथियन रोड के साथ कुछ दूरी तय करना इस बात का संकेत था कि मैं अभी भी निकोल्सन के पदचिन्हों पर ही हूं. वहां दाहिनी ओर निकोल्सन रोड थी जिस पर एक ओर दुकानें और मकान बन गये थे जबकि दूसरी ओर दीवार का एक दूसरा हिस्सा था."
"आधे मील से अधिक की दूरी पर इसमें इतना मामूली बदलाव आया है कि सहज ही ये महसूस होता है कि निकोल्सन खुद यहां हैं और मानो वो दीवार के साथ ही चल रहे हैं. लेकिन तभी आधुनिक दिल्ली सामने आने लगी."
"निकोल्सन के निधन के बाद के दशक में निर्मित पुरानी दिल्ली स्टेशन की ओर जाने वाली रेलवे लाइन पर अचानक ही निकोल्सन रोड खत्म हो गई. थोड़ा सा रास्ता बदलकर रेलवे के दूसरी ओर जाने पर मैं वहां पहुंच गया जहां कभी काबुल गेट था."
"इसके दक्षिण में दीवार के साथ साथ नया बाज़ार रोड चल रही है मगर निकोल्सन को कहां गोली मारी गई थी? बर्न बैस्टियन और लाहौरी गेट अब वजूद में नहीं थे. उनकी दिशा में चलने पर उस स्थान का पता लगाना असंभव था. नया बाजार की संकरी लेन में बैठे लोग निकोल्सन के नाम से अनजान थे और वे मदद करने में सक्षम नहीं थे."
"हमेशा से ही ये इतना मुश्किल नहीं था, लार्ड कर्जन ने 20वीं सदी में पहले वायसराय के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीरी गेट के पास से इसी तरह की यात्रा शुरू की थी. काबुल गेट से करीब 80 गज की दूरी पर उन्हें दीवार पर एक पट्टिका मिली थी."
"पट्टिका पर वो जगह चिन्हित थी जहां ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन 14 सितंबर, 1857 के हमले में बुरी तरह जख्मी हो गए थे."
दिल्ली में ये दीवार और पट्टिका 1940 के दौर में ली गई तस्वीरों में देखी जा सकती है परंतु अब दोनों को ही ध्वस्त कर दिया गया है. हालांकि यादें अभी भी बाकी हैं.

Friday, April 5, 2019

التليغراف: "ليبيا تستعد للحرب"

تناولت أغلب الصحف البريطانية الصادرة صباح الجمعة الملف الليبي، ومنها جريدة التايمز التي نشرت تقريرا موسعا لمراسلها في ليبيا ريتشارد سبنسر بعنوان "القائد المارق يأمر قواته بالزحف على طرابلس".
وتوضح الجريدة أن استيلاء اللواء السابق في جيش القذافي خليفة حفتر على مدينة غريان التي تبعد 80 كيلومترا فقط عن العاصمة الليبية طرابلس يهدد باشتعال الحرب مرة اخرى في ليبيا.
وتضيف الجريدة أن حفتر الذي يلقى الدعم من كل من مصر والإمارات تمكن من تأسيس أكبر منطقة حكم ذاتي تحت سيطرته في شرق ليبيا منذ انهيار نظام القذافي.
أما جريدة الغارديان فنشرت تقريرا لكبير مراسليها لشؤون الشرق الاوسط رولاند اوليفانت يقول فيه إن ليبيا تستعد للحرب المقبلة والتي قد تدمر كل ماتبقى بعد سنوات القتال السابقة.
ويضيف اوليفانت ان اللواء السابق في الجيش الليبي إبان حقبة الديكتاتور السابق معمر القذافي تحدى الأمم المتحدة وأصدر الأوامر لقواته بالزحف نحو العاصمة طرابلس بهدف الإطاحة
وتضيف الجريدة أن السراج من جانبه أصدر اوامره بنشر القوات وتنفيذ غارات جوية عند الحاجة لوقف أي هجوم على المدينة كما أن المجموعات المسلحة القوية التي تسيطر على منطقة مصراته اعلنت انها مستعدة للمشاركة في أي عمليات عسكرية لدعم حكومة السراج في وجه قوات حفتر.
وتشير الجريدة إلى ان محاولة حفتر لم تتأخر سوى ساعات معدودة عن زيارة انطونيو غوتيريش الأمين العام للأمم المتحدة لطرابلس لمقابلة السراج بهدف دعم مؤتمر للمصالحة الوطنية في ليبيا كان من المخطط أن ينعقد منتصف الشهر.
وتوضح الجريدة أن حفتر يسيطر على الشرق الليبي ويقيم حكومته في مدينة بنغازي ويحظى بدعم مصر والإمارات في محاولة لتنصيب حاكم علماني قوي يعيد الأمور إلى ماكانت عليه في ليبيا ويقهر الفصائل الإسلامية بينما يقول منتقدوه إنه سيصبح حاكما ديكتاتوريا جديدا على غرار القذافي لو سيطر على غرب البلاد.
الغارديان نشرت تقريرا عن ملف الحرب في اليمن بعنوان "الكونغرس يصوت لإنهاء الدعم العسكري للسعودية في حربها في اليمن".
يقول التقرير إن الكونغرس أصدر بذلك القرار النهائي بهذا الصدد في محاولة غير مسبوقة لتقييد قدرة الرئيس الأمريكي على الذهاب إلى الحرب بشكل عاجل كما أنه يشكل تحديا جديا لسياسات دونالد ترامب الخارجية.
وتعتبر الجريدة أن صدور القرار من الكونغرس خاصة في هذا التوقيت يمثل أزمة جديدة بين الكونغرس وترامب الذي يهدد بوقف تنفيذه حيث كشف البيت الأبيض أنه يعتقد أن القرار يشكل انتهاكا للدستور الأمريكي.
وتشير الجريدة إلى أنها المرة الأولى التي يصدر فيها الكونغرس قرارا حسب قانون حرب 1973 لوقف السلطات التنفيذية للرئيس ومنعه من الزج بالبلاد في حروب خارجية طويلة الأمد.
ويعتبر التقرير أن قطاعا كبيرا من النشطاء يعتقدون أن الطريقة الوحيدة لوقف الحرب المستمرة منذ 5 سنوات في اليمن و منع وقوع مجاعة قاسية تقتل الملايين هي ان تقوم الولايات المتحدة بالضغط على السعودية لوقف الغارات الجوية التي تشنها في اليمن والانخراط في محادثات السلام.
بحكومتها التي يتزعمها فايز السراج و تحظى بدعم المنظمة الدولية.
التايمز نشرت مقالا لمراسلها لشؤون الشرق الأوسط ريتشارد سبنسر بعنوان "المفاعل النووي السعودي يثير المخاوف من سباق تسلح جديد".
وتقول الجريدة إن المملكة العربية السعودية أوشكت على الانتهاء من مفاعلها النووي الأول رغم انها لم تنته بعد من الاتفاقات المطلوبة مع الأمم المتحدة وهو الأمر الذي يهدد بسباق تسلح جديد في منطقة الشرق الأوسط.
وتوضح الجريدة أن صور الأقمار الاصطناعية من مدينة الملك عبد العزيز للعلوم والتكنولوجيا قرب الرياض توضح أن المفاعل يمكن ان يبدأ العمل في خلال أقل من سنة حسب ما تنقل عن روبرت كيللي مدير التفتيش السابق في الوكالة الدولية للطاقة الذرية.
وتضيف الجريدة أن شركة إنفاب الحكومية الأرجنتينية هي التي تتولى بناء المجمع والذي يبدو أنه اكثر تطورا مما ظن أغلب المحللين بينما تخطط المملكة للإعلان عن مناقصات لبناء مفاعلين نووين آخرين بغرض توليد الكهرباء حسب ما يقول المسؤولون لكن عددا من اعضاء الكونغرس الأمريكي خاصة من الحزب الديمقراطي يخشون من ان المملكة تخطط للدخول في سباق للتسلح النووي مع إيران.